संस्कार और आत्म-स्मृति से ही समाज सशक्त होता है। ऋषि जी विभाग प्रचारक-बस्ती विभाग

22 जनवरी को ऐतिहासिक दिवस के रूप में मनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए विभाग प्रचारक जी ने कहा कि हिंदू समाज को बार-बार इसलिए जगाना पड़ता है। क्योंकि हम अपने गौरवशाली इतिहास और संस्कारों को भूलते जा रहे हैं। इस दिन मंगल वेश में आरती एवं दीपोत्सव जैसे कार्यक्रम आयोजित कर इसे उत्सव के रूप में मनाया जाना चाहिए। ताकि अगली पीढ़ियों को इस दिवस का महत्व बार-बार याद न दिलाना पड़े।
कार्यक्रम में कहा गया। कि यह दिवस केवल आयोजन नहीं,बल्कि अपने घर-परिवार में महत्व समझाने और उत्सव की परंपरा स्थापित करने का अवसर है। वक्ताओं ने स्मरण कराया कि हमारे आराध्य प्रभु श्रीराम जहां निवास करते थे। वहां तंबू बदलने के लिए भी कभी न्यायालय की अनुमति लेनी पड़ती थी। ऐसे ऐतिहासिक संदर्भ हमें संघर्ष,धैर्य और आस्था की सीख देते हैं।
ऋषि जी ने स्पष्ट किया। कि अखंड भारत की संकल्पना का आधार प्रभु श्रीराम ही है। यदि भारत को अखंड बनाने का विचार साकार करना है।तो वह राम-तत्व और उनके आदर्शों के माध्यम से ही संभव है। इसी भाव को जीवित रखने के लिए 22 जनवरी को उत्सव रूप में मनाया जाना आवश्यक है। ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां इसे सांस्कृतिक पर्व के रूप में अपनाएं।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि सारी सुविधाएं केवल सरकार से अपेक्षित नहीं होती। कुछ सुविधाएं संस्कारों से और समाज की आत्म-स्मृति से प्राप्त होती हैं। जब आत्म-स्मृति समाप्त हो जाती है। तब समाज कमजोर पड़ जाता है। इसलिए संस्कारों का संरक्षण और परंपराओं का निर्वाह अत्यंत आवश्यक है।
उपरोक्त विचार विभाग प्रचारक ऋषि जी भाई साहब ने व्यक्त करते हुए समाज से आह्वान किया।कि 22 जनवरी को ऐतिहासिक दिवस के रूप में मनाने की परंपरा विकसित की जाए।और इसे जन-जन तक पहुंचाया जाए।
